तिरछी चितवन देखकर, मोहित हुआ जहान


कृष्ण-सुदामा
श्याम   वर्ण  सुंदर  नयन,  शोभा   होंठ  अपार। 
वंशी  अधर   सुहावनी, तिलक  सजा  लिलार।।1
मोर  मुकुट  सिर  पर लगा, कुंडल झलके कान।
तिरछी  चितवन देखकर, मोहित  हुआ जहान।।2
पीत  वसन  को ओढ़कर, लकुटी  लेकर  हाथ। 
लकड़ी   लेने  वन   गये, सखा  सुदामा  साथ।।3
काले   काले    बादरा,   बरसत   मूसल    धार।
ठिठुरन  बढ़ी  शरीर  में,  चढ़े   पेड़  की  डार।।4
चना   चबाते    देखकर,  बोले    श्री  भगवान।
मैं  भी  तो  भूखा  सखे, व्याकुल  होते   प्रान।।5
सखा   मुझे  भी  चाहिए, भेजा  है   गुरु  मात।
किटकिटा  रहे   शीत से, मित्र  बत्तीसों  दांत।।6
सारे    चने  बिखर   गए,  छूट  गई   है   गांठ।
पीताम्बर  जब  मेरा ,  उलझ  गया  था  सांठ।।7
मन  ही   मन  में दुख हुआ, खाया मेरा  भाग।
इसी  जनम  में  भोगना, लगा लिया जो दाग।।8
दरिद्र  सुदामा   हो  गए,  कृष्ण   द्वारकाधीश।
पूरण  किया  उधार नहिं, नहिं मिलें जगदीश।।9
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      दोहे:-कमलेश नागवंशी-बनखेड़ी

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तिरछी चितवन देखकर, मोहित हुआ जहान

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