मौनी महाराज, एक अविस्मरणीय यात्रा

                     🪴एक अविस्मरणीय संस्मरण 🪴 

                        🙏 जय मौनी महाराज 🙏 

      मेरी स्मृति में आज भी वह दृश्य फिल्म की तरह चल उठता है, जब मैं पहली बार मौनी बाबा दर्शन के लिए गया था। महिना था सावन का, और मुझे याद है उस समय मैं कक्षा आठवीं में अध्ययन कर रहा था मतलब सन् 1985 की बात है। मेरे गांव से कुछ लोग कढ़ैया कराने जा रहे थे। मौनी बाबा का इतिहास कब का है किसी को पता नहीं। हां पर आसपास के लोग मौनी बाबा को मौनी महाराज के नाम से जानते हैं। उन्हें पास के लोग मौनी दादा जी भी कहते हैं।
       मुझे याद है जब हमारे या हमारे आस-पास के गांवों के लोगों को कोई काम शुरू करना होता था तो मौनी महाराज को याद करते हुए किया जाता था। उनकी ओर मेरी श्रद्धा शुरू से रही है। किसी का कोई मवेशी जंगल में गुम हो जाता तो दादा जी को याद किया करते थे, वास्तव में वह पशु बिना नुकसान के घर वापस भी आ जाता था, सिर्फ जंगल में खोया हुआ। किसी जानवर का शिकार नहीं होता था। अगर किसी की आंख में गोहरी हो जाए तो दादी कहती थीं बुधवार के दिन सुबह-सुबह मौनी दादा की ओर मुंह करके बैठ जाओ और दादा जी कहो दादा जी तेरा पहाड़ छोटा मेरी गोहरी बड़ी, शाम तक आराम। लोग करते थे और फायदा भी मिला।
        मैं मेरी पहली दर्शन यात्रा के बारे में बता रहा था, गांव से जाने बालों की संख्या 10-12 थी। मैंने जाने की जिद की तो उन्होंने मना कर दिया कि वहां पर शेर रहता है, पर दादा जी का बुलावा था मान गए। मेरे काका भी थे।एक वन विभाग के नाकेदार साहब जिन्हें सभी कंठीलाल जी पुकारते थे। सभी ने अपना-अपना सामान रखे हुए थे। एक कढ़ैया, पोटली में भुना हुआ आटा, गुड़, नारियल आदि। चूंकि मैं सबसे छोटा था सभी मुझे तंग कर रहे थे, कहते थे शेर मिलेगा तो शेर को दे कर आयेंगे। फिर भी मैं उनके साथ नंगे पैर चल रहा था। मेरे गांव से लगभग 8 किलोमीटर पथरीले रास्ते पर चलना था।पानी गिर रहा था। उस समय इतनी सुविधाए उपलब्ध नहीं थीं। कुछ लोग भी नंगे पैर थे। कुछ लोगों को जानकारी थी कि पहाड़ के इस पांव से चढ़ कर जाते हैं ( यहां बता दूं पहाड़ की ऊंचाई से निकला हुआ हिस्सा जो ढलान बनाता हुआ जमीन में मिल जाता है इसे गांव के लोग पहाड़ का पांव कहते हैं क्योंकि यही पहाड़ को संभाले होते हैं।ऐसे पैर पहाड़ के चारों ओर होते हैं) रास्ता ऐसा जिसे हम अपनी स्थानीय बोली में गैल कहते हैं उससे भी खतरनाक, रिमझिम बारिश से पैर सरकने का डर, पैर सरका नीचे खाई में। ऐसा लग रहा था जैसे मैं ऊंट के ऊपर चल रहा हूं, दोनों तरफ खाई।
       बहुत मुश्किल से ढूंढ़ने पर दादा जी का चबूतरा मिला, क्योंकि जंगली घास बहुत घनी और ऊंची थी। दादा जी का छोटा सा चबूतरा था, जिसके ऊपर लगभग एक फुट ऊंचा मंदिर। चबूतरे पर सड़े-गले पत्तों का ढेर,सभी ने मिलकर साफ किया। एक साथी को गांजा की पुड़िया, एक को बीड़ी मिलीं। यह किसी के द्वारा दादा जी को भेंट किया गया होगा चट्टानों की ओट में पेड़ के नीचे पत्थर का चूल्हा बनाया।आग जलाने के लिए पानी से भीगी लकड़ियों को टुकड़े-टुकड़े कर फाड़ कर आग जलाई। सभी भीगे हुए थे। सभी ने अपने अपने कपड़ों को सुखाने की नाकाम कोशिश की। मैं लोगों से दूर नहीं जा रहा था, वास्तव में अब मुझे जंगली जानवरों का डर लगने लगा था। मैंने पहली बार देखा कि बरसते पानी में आग कैसे जलाई जाती है। किस सूखे पेड़ की लकड़ी से। प्रसाद बना, दादा जी को चढ़ाया(भोग लगाया) सबने बैठ कर खाया और सब दादा जी को नमन करके वहां से चल दिए।
      शायद उन्हें अंदाज़ा हो गया था कि कितने बजे हैं बिना घड़ी के, पर मुझे तो सुबह से अभी तक एक जैसा लग रहा था दो-तीन दिन से सूरज नहीं निकला था, लगातार पानी की रिमझिम।
      लौटते समय कुछ लोगों ने सोचा जंगल से कुछ लकड़ियां रख लेंगे,ढ़ूढने के लिए जंगल में इधर-उधर चले गए। पता चला कि हम रास्ता भूल गए हैं,लोग नाम लेकर जोर से पुकार रहे थे। मैं उनके पीछे पीछे चल रहा था। कब राह मिली मुझे पता नहीं। रास्ते में मुझे खाने लिए वही हलवा दिया क्योंकि मुझे भूख लगी। जंगल से बाहर निकल चुके तब तक रात हो चुकी थी। पानी रिमझिम-रिमझिम चल रहा था। 
     इस पर्वत माला पर उनके दो स्थान बने हुए हैं प्रथम यही ऊपर दूसरा स्थान फतेहपुर से सहावन गांव (जिला नर्मदापुरम् से जिला छिंदवाड़ा) को जोड़ता है वहां अंजनी नदी के तट पर स्थित है।माना जाता है कि पथिक लोगों ने अपनी सुरक्षा के लिए बनाया है क्योंकि वे लगभग डेढ़ किलोमीटर की ऊंचाई चढ़ कर और फिर वापस आ कर अपनी यात्रा पूरी करने में समय लगता है। मौनी महाराज के पर्वत के ऊपर पानी कुण्ड है जिसमें हमेशा स्वच्छ जल भरा रहता है जबकि नीचे दूर-दूर तक पानी नहीं है। शंकर जी का स्थान होने के कारण यहां बेल पत्र के पेड़ों की अधिकता है।
     यह स्थान प्रकृति से परिपूर्ण, जड़ी-बूटियों का खजाना है। रात को यहां से बनखेड़ी की ओर देखते हुए आंखें नहीं थकतीं। ऐसा लगता है जैसे हम आसमान में खड़े हैं और सारे तारे जमीं पर। यहां जंगली जानवरों का भय नहीं रहता। बाघ को कई बार देखा गया किंतु इस क्षेत्र में बाघ द्वारा जन हानि आज तक नहीं सुनी गई। अब कुछ लोगों ने मिलकर समिति बनाई है जो यहां विकास कार्य कर रही है। रास्ते का भी समय-समय पर सुधार किया जाता है।
    मुझे दादा जी में पूरी आस्था है और मैं कभी भी जाता रहता था। मुझे एक बार बहुत आश्चर्य हुआ हमारे घर एक आदमी आया जिसको हमारे घर कुछ काम था। उसका स्वागत उसी तरह से किया जैसा अक्सर गांव में होता है। हम बैठे हुए थे, उसने अचानक प्याला मांगा हम समझ नहीं पाये। तब उन्होंने कहा मुझे चिलम चाहिए हमने कहा आप तो चिलम पीते नहीं है,तब उन्होंने बताया मैं मौनी दादा हूं। सभी के हाथ श्रृद्धा से जुड़ गए। फिर उन्होंने मेरे बारे में और सभी के बारे में बताया जो अपने सिवा कोई नहीं जानता था। कौन कितनी बार वहां गया दर्शन करने क्या-क्या मनौती मांगी है। 
     आज वहां पर मंदिर बन गया है। प्रत्येक वर्ष महाशिवरात्रि पर्व पर एवं मौनी अमावस्या को मेला लगता है। नव दुर्गा पूजा पर जवारों की स्थापना की जाती है। जिन लोगों की कामना पूरी होती है वे भंडारा कराते हैं। इस वर्ष दादा जी के स्थान पर यज्ञ हो रहा है।
     आज भी मुझे उन पर वही विश्वास वही श्रृद्धा है। मेरी दादा जी से प्रार्थना है जो मुझ पर कृपा की वैसी सब पर बनाए रखें। जय मौनी दादा जी 🙏

 👉गंगा करे सवाल कृपया इसको भी पढ़ें 

टिप्पणियाँ