गोपियां करती नर्तन


                         1
मुखड़ा  सखी  निहारती,  होते  जो  बृज  धाम।
यमुना  जल  पग  पूजती, तर  जाती यह चाम।।
तर  जाता  यह  चाम, श्याम की सुनकर मुरली।
लोचन  करती  कैद, छवि  जो  हो  गई धुंधली।।
भूख  लगे  ना  प्यास, सुनो  तुम  मेरा    दुखड़ा।
आ   जाते  घनश्याम, दिखाते   सुंदर   मुखड़ा।।
                         2ंद
रुनझुन   बजती  पैंजनी,  मधुर  सुनाती  तान।
घुटनों  के  बल  दोंड़ते,  बाल  रूप  भगवान।।
बाल  रूप  भगवान,  कपाल   पिछौरा  पीला।
बैठ   यशोदा   गोद,  दिखायें   माधव  लीला।।
माखन  ढेला   हाथ,  साथ   में  बंशी  सजती। 
हर्षित   मेरे   नैन, देखते   रुनझुन     बजती।।
                        3
वृंदावन   की   राधिका,    बरसाने  की   नार।
राग   रागिनी  गा  रहीं,  नाचत   नंद   कुमार ।।
नाचत    नंद  कुमार,  बाजती   पग  पैंजनियां।
बाढ़त   राग   खुमार,   राधिका  लेत  बलैयां।।
जपत   श्रीश  पद  रेख, गोपियां  करती  नर्तन।
मूरति   नचती   देख,  वृंदा    नचत   वृंदावन।।
                        4
मुरली   सुनकर  श्याम की, करती थी मैं काम।
वे तो   जाकर  बस गए, सखी  द्वारका   धाम।।
सखी   द्वारका   धाम,   बसायी   सुंदर   नगरी।
भूले   राधा    प्रेम,   सहेली   माखन    गगरी ।।
विरह   सताये   खूब,    गोपियां   होतीं   दुबली।
मिलती   सुनकर आस, बजाते  मधुवन  मुरली।।
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        कमलेश नागवंशी-बनखेड़ी 🌹
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