पापा की लाडो


                     🌹पापा की लाडो🌹
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                                 1
खड़ी   तोतली   बोली  बोले,  मम्मी   पापा   कहती    थी।
पांव पायलिया छन छन बाजे, डगमग डगमग चलती थी। 
जली   कटी   वो  रोटी    सेंके,  सब्जी   खारी  रोनी   थी।
आज   बनाई   मैंने  पापा, मुझको   कौर   खिलाती   थी। 
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कभी  ना  मचली कठिन खिलौने, पापा जेब टटोली  थी। 
बात   करती  बड़ी-बड़ी   और,   बनकर रहती नानी थी।
कभी   डांटती   मैडम   बनके, पापा   पाठ   पढ़ाती  थी।
नहीं  डरी  वो   बिन गलती  के, गलती  नहीं सुहाती  थी।
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मिल  जाए छोटा सा तोहफा, खुशियां बहुत मनाती थी।
छोटे-छोटे   खर्चे   में   वो,  अपना   काम   चलाती  थी।
ढाल   रही है  वो  पापा   की, नहीं  किसी  से डरती थी।
डर   नहीं  था  उसे  किसी  का, आग आगे  चलती  थी।
                               4
कभी रुलाया नहीं  किसी को, बात  सभी की मानी थी।
नहीं शिकायत कभी किसी से,ना कुछ मन में ठानी थी।
पापा   की  वो  रही   लाड़ली,   मर्यादा   की  वानी  थी।
कर   सका  ना कोई बराबरी, वह  तो  बड़ी सयानी थी।
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कहां  से  सीखी  सीख  स्यानी, अनुभव जैसे बोल  रही।
बित्ते  भर  की  थी  जबसे वो,  कोयल  जैसे  बोल  रही।
पापा   की   गोदी  में   बैठे,  मां  के  आंचल  खेल  रही।
आज   देखता  आंखें  खोले, ठुमठ-ठुमक के नाच रही।
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किया   बहाना   गिरने  का तो,  नन्हे  हाथ  उठाती थी।
झूठ-मूठ  से  बहुत  डांटती,  सच्ची   दवा  लगाती  थी।
छोटे-छोटे   हाथों  से  वो,  सिर  को  खूब  दबाती  थी।
नहीं   दवाई  मैं   लेता  तो,  मरकर  मुझे ‌दिखाती  थी।
                             7
आज  अनाथ  हो  गया  हूं  मैं,  उसे  विदाई  करना है।
तेरी   याद   बहुत   आयेगी,   आंखों   नीर   बहाना  है।
आशीषों   की   भरकर   झोली, मेरे   पंछी  उड़ना  है।
छोड़   दिया  है आज घोंसला,  उसको  नहीं बताना है।
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उसने   कर्ज  दिया है मुझको, उसका कर्ज चुकाना है।
शपथ   राम  की   लेता  हूं  मैं,  तेरी  गोद  जन्मना  है।
जन्म-जन्म   का नाता  बेटी,  उसको  मुझे निभाना  है।
नहीं   डांटना  तू  पापा  को,  मुझको  ये   वर पाना  है।
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         रचना:- कमलेश नागवंशी-बनखेड़ी 

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