मुरली सुनकर श्याम की


         मुरली सुनकर श्याम की
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                      (1)
मुरली सुनकर श्याम की, करती थी मैं काम।
वे तो जाकर बस गए, सखी द्वारका धाम।।
सखी द्वारका धाम, बसायी सुंदर नगरी।
भूले राधा प्रेम, सहेली माखन गगरी ।।
विरह सताये खूब, गोपियां होतीं दुबली।
मिलती सुनकर आस, बजाते मधुवन मुरली।।
                        (2)
मुखड़ा सखी निहारती, होते जो बृज धाम।
यमुना जल पग पूजती, तर जाती यह चाम।।
तर जाती यह चाम, श्याम की सुनकर मुरली।
लोचन करती कैद, छवि जो हो गई धुंधली।।
भूख लगे ना प्यास, सुनो तुम मेरा दुखड़ा।
आ जाते घनश्याम, दिखाते सुंदर मुखड़ा।।
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       “कमलेश नागवंशी बनखेड़ी”🙏


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