संत भूरा भगत विनय चालीसा


                          श्री गणेशाय नमः
             संत श्री भूरा भगत महाराज चालीसा
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     श्लोकः- ऊँ सर्व मंगल मांगल्ये,शिवे सर्वार्थ साधिके।
                शरण्ये त्र्यंबिके गौरी. नारायणी नमोस्तुते।।
     दोहाः- समरथ गुरू में पाहिओं. शंभू गौरी गणेश।
               करहु कृपा मम दास पर,भूरा भगत महेश।।

                           ****चौंपाई****

दूसर  माह  शुक्ल  की  नवमीं,      लियो  अवतार   कियो सधरमी ।।१
लांझी  गांव  दिव्य  अति सुंदर,      जन्मे  नागवंश  शुभ  अवसर ।।२
जय जय  भूरा भगत गुरु देवा,      ग्रहण   करो   अब   मेरी  सेवा  ।।३ 
अल्पायु  से  जप  तप  कीन्हा,      तब   शिव  शंभु  तुमको  चीन्हां ।।४
शिव  शंकर   के  दर्शन   पाए,      चौरा  गढ़    को   आप  बसाए।।५
नीर     देनवा   के    नहलाऊं,      लौंग   सुपारि    तुम्हे    चढ़ाऊं ।।६
सुंदर   सेंदुर   तिलक सुहाता,      मीठी    खारक   भोग   लगाता ।।७
ध्वजा  नारियल   तुमें  चढ़ाऊं,     बार बार    मैं    शीश    नवाऊं  ।।८
वियावान   में    करें    बसेरा,      तीर      देनवा      डाला    डेरा ।।९
माँ    कोतमा  शरण   तुम्हारी,     इस   दुनिया  में  आप  हमारी ।।१०
सांगाखेड़ा    तीरथ      आऊं,     जहां   बसे   गुरु   देवा  पाऊं  ।।११
सूत   कात   उपवीत  बनाऊं,      शिव  शंकर  को  मैं   पहराऊं ।।१२
तुम    भक्तों  को  राह  बताते,     चौरागढ़     उनको    पहुचाते।।१३
वंश  कातिया   भगत  कहावें,     पूर्ण   आहुति  आप   करावें   ।।१४
मनुज  समाज के  संत तुम्ही,      अकिंचन  के  अब अंक तुम्ही ।।१५
भेंटहि मूरत   मिलहिं अशीषा,     मिटहि  सपूरन बदन कलेषा  ।।१६
पांव   पिआदे   चलत  समूहा,     जपत    निरंतर    बृषारूढ़ा  ।।१७
पग जतरा जो  भी जन करते,     चौरागढ़   पर   दर्शन   करते  ।।१८
जपत करत  कट बंधन  भारी,     दासन   दास   सदा   हितकारी १९
अबहिं   बिराजो    मेरे   देवा,     अविरत   करत  रहूं   मैं सेवा  ।।२०
तन-मन-धन समर्पित  कीन्हां,     माँ-बाप-गुरु    आपहि   चीन्हा।।२१
गृहस्थ   योगी   आप  कहाते,     माई   संग  में  राह   दिखाते ।।२२
सिला  रूप  में  आप  विराजे,    सिर  पर  हाथ  शंभु का साजे ।।२३
पग-पग पर निश्छल वनवासी,     आरत  करत भजत कैलाशी ।।२४
प्रभू    द्वार    करत   सेवकाई,    आठों  यामहि  पंथ   दिखाई ।।२५
शंभु-शंभु     लगते    जयकारे,    चलत  बटोही  कबहु  न हारे ।।२६
हिंसक-हिरण  संग  रह  वासी,    जहां  भगत शंभू  अभिनासी ।।२७
जन्म  चारि    तुम्ही    रखवारे,    अण्ड-पिण्ड  सब पालन हारे ।।२८
दींहे    सूत्र   किया   उपकारा,     मंगल भया  सकल  संसारा  ।।२९
जो जन मिल कीरत को गावें,      मिटहीं  दोष  परम  पद पावें ।।३०
चरण कमल   में शीश  नवाऊं,    आपहि कृपा  मनोरथ  पाऊं ।।३१
सुबह शाम  हम  कीरत करते,     शिव शंकर  कष्टों  को हरते  ।।३२
लिपट क्ष गले   जो  कोई  भेटें,    तन  के कष्ट  कबहु ना लौंटें ।।३३
करत  आरती  सबहि  समाजा,    सफल होंय उन्हीं के काजा  ।।३४
दिनमुख   करते  जो जन सेवा,    जिन  पर दय़ा करें गुरु देवा ।।३५
देवा     देउ    मोहि   सतसंगा,     जनम होय नहि कीट पतंगा ।।३६
पाखंड-झूठ-कपट-अरु माया,     मन निश्छल अरु निर्मल काया।।३७
ऐसा   करम   करहुं   मैं नाथा,    कथहि 'श्रीश' सबही के साथा।।३८
समझ मोहि निज पूत भिमाला,    दीजो सद्गति करहु  निहाला ।।३९
विनय  चलीसा जो  जन  गावे,    छूटे  जगत भगत   गति पावे ।।४०

         दोहाः-
हरण करो सब दोष अब, मोहि देहु सद्ज्ञान।
                  पूजन भी स्वीकार कर, शरण पड़ा हूँ आन।।
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        उमापति महादेव की जय,भूरा भगत महाराज की जय....
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                     सेवकः-कमलेश नागवंशी,बनखेड़ी


 

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