हार कहां हमने मानी है
हार कहां हमने मानी है *****
किनारा मिले न मिले,हार कहां हमने मानी है,
सोच चले हैं जिस मंजिल पर,पा नी है पा नी ही है,
कश्ती डूब भले ही जाए,गोता लगाना क्यों न पड़े
पर्वत पथ को रोकें,सन्मुख क्यों न हों जाएं खड़े,
तूफान, आंधी सी घटाएं,चाहे बादल क्यों न बरस पड़े,
लहरों के पार जाना है तुझको,अभी तो और रवानी है।
सोच चले हैं जिस....1
पतवार भले ही छूटे, हौसला बनाए रखना तुम,
हटा दो राह के रोड़ों को, आगे कदम बढ़ाना तुम,
निशां बनाते कदमों से,राह बनाते जाना तुम,
खून अभी तो ताजा है, और भरी हुई जवानी है।
सोच चले हैं जिस पर...2
गर पाना ठान लिया तूने तो,बता दो अनल अंगारों को,
मुट्ठी में है अंबर और अंजलि में अर्णव खारा को,
पीछे लहरें कर कदमों के, मदहोश धराधरों को,
झुकना,पर रुकना न अब,राह तुझे दिखानी है।
सोच चले हैं जिस...3
शान न जाए,गुरुता की,उसका मान बढ़ाना है,
है कोविद जग का तू, तुझको अब यही दिखाना है,
स्व कर्म क्षेत्र में तुझको, ऐसा पाठ पढ़ाना है,
कोटिल्य के अर्थशास्त्र से,सीखी सीख सिखानी है,
सोच चले हैं जिस मंजिल पर,पा नी है पा नी ही है।...4
******
कविता-कमलेश नागवंशी-बनखेड़ी 🙏
किनारा मिले न मिले,हार कहां हमने मानी है,
सोच चले हैं जिस मंजिल पर,पा नी है पा नी ही है,
कश्ती डूब भले ही जाए,गोता लगाना क्यों न पड़े
पर्वत पथ को रोकें,सन्मुख क्यों न हों जाएं खड़े,
तूफान, आंधी सी घटाएं,चाहे बादल क्यों न बरस पड़े,
लहरों के पार जाना है तुझको,अभी तो और रवानी है।
सोच चले हैं जिस....1
पतवार भले ही छूटे, हौसला बनाए रखना तुम,
हटा दो राह के रोड़ों को, आगे कदम बढ़ाना तुम,
निशां बनाते कदमों से,राह बनाते जाना तुम,
खून अभी तो ताजा है, और भरी हुई जवानी है।
सोच चले हैं जिस पर...2
गर पाना ठान लिया तूने तो,बता दो अनल अंगारों को,
मुट्ठी में है अंबर और अंजलि में अर्णव खारा को,
पीछे लहरें कर कदमों के, मदहोश धराधरों को,
झुकना,पर रुकना न अब,राह तुझे दिखानी है।
सोच चले हैं जिस...3
शान न जाए,गुरुता की,उसका मान बढ़ाना है,
है कोविद जग का तू, तुझको अब यही दिखाना है,
स्व कर्म क्षेत्र में तुझको, ऐसा पाठ पढ़ाना है,
कोटिल्य के अर्थशास्त्र से,सीखी सीख सिखानी है,
सोच चले हैं जिस मंजिल पर,पा नी है पा नी ही है।...4
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कविता-कमलेश नागवंशी-बनखेड़ी 🙏
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