डरी-डरी सी वो आंखें, सहमें सहमें लोग

 आदत से मजबूर

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बिच्छू  जैसे  डंक  को,  रखते  अपने  पास।
मौका  पाकर  मारते,  देते  जग  को  त्रास।।1
कागा  जैसी  मति  रखें,  विषधर  जैसे दांत।
अजगर  जैसी  चाल से,  सबको  देते  मात।।2
पाठ  पढ़ें  उपकार  के,  फिर भी कोसों दूर।
मौका  पाते  घात  करें, आदत  से  मजबूर ।।3
जिसमें  करते  भोज   है,  पत्तल  देते  छेद।
आदत  से  मजबूर  हैं,  नहीं   मनाते  खेद।।4
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छीना  झपटी   हो  रही, जिसे  मिला  वो शेर।
छोड़ा   जिसने  हाथ से,  लेते   गीदड़  घेर।।5
सबको  रखते  हासिए,  कौन  रहे  हकदार।
छीना  झपटी  चल रही, किसकी हो सरकार।। 6
नहीं  सुहाती  दिल्लगी,  हृदय  बहुत कमजोर।
प्रेम  करे   पर टूटता,  जहां  किया  पुरजोर।।7
करूं  वंदगी  दूर  से,  टूटे  दिल    के   तार।
गहरे   घाव   कुरेदते,  और   छिड़कते क्षार।।8
दिल्लगी और  वंदगी,  अद्भुत करती  मार।
राम  राम  है  दूर  की, छोड़  मजाकी नार।।9
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फसल उगाई  जतन से, बहा पसीना खूब।
एक  जरा सी   भूल से, गई तपस्या  डूब।।10
गई  तपस्या  डूब,  बिजूका  नहीं  लगाये। 
नहीं  बनाई   बाड़, जानवर कहां भगाये।।11
सूना  छोड़ा  खेत, रुग्णता  बहुत  सताई।
सारी हुई बेकार, जतन  से  फसल उगाई।।12
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आज देश की शान में, लगे हैं चारों चांद।
मान बढ़ाने बेटियां, गईं टाॅस को फांद।।13
आज बेटियां जीत गईं, सोना भरी सुगंध।
मान बढ़ाने बेटियां, खाईं थीं सौगंध।।14
अपनी तूती बोलती, विश्व पटल पर आज।
हरमनप्रीत कौर का, अच्छा था आगाज।।15
युगों-युगों से छोरियां, रखें देश का मान।
हिंद देश की नारियां, होती बहुत महान।।16
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कोई   इज्जत  मान नहि,  कैसे  हो  उद्धार। 
नहीं सुरक्षित नारी है,कुछ तो करो विचार।17
क्या राज है यही  राम का, हरते गुण्डे लाज।
निर्बल  आज  तरस रहा, दाने  दाने  आज।।18
सब तरफ बेकारी है, शिक्षित फिरें बेकार।
अगुवा सारे शकुनि है, कुछ तो करो विचार।।19
धरती  नदियां बिक रहीं, कानन हुए शिकार।
गगन पवन में बिष घुला, कुछ तो करो विचार।।20
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डरी-डरी  सी  वो आंखें, सहमें  सहमें लोग।
खड़ा  कृषक   दरबार में, कैसा  है  संजोग।।21
आज किसान मांग रहा, खेतों को जो खाद।
दिनभर लगा कतार में,भूख रही ना याद।।22
हरी भरी फसलें नहीं, बिजली मिले न रोज।
उचित दाम मिलता नहीं, खोता अपना भोज।।23
कृषक  छोटे  दीन  रहे, बड़े   कमाते माल।
डरें सदा हड़ताल से, फिर भी उधड़े खाल।।24
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स्वर्ण छुए आकाश जब, पैसा गिरता दाम।
धनिक भरें गुदाम और,मुख ताके आवाम।।25
स्वर्ण छुए आकाश तब, गुप्त होय व्यापार।
धनिक बढ़ाते कोष निज, दीन रहें लाचार।।26
दीनों के वश में  नहीं, स्वर्ण छुए  आकाश।
नकली  जेवर  बन रहे, लूट  रहे  बदमाश।।27
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     ✍️:-कमलेश नागवंशी बनखेड़ी

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डरी-डरी सी वो आंखें, सहमें सहमें लोग

 आदत से मजबूर ********************************* बिच्छू  जैसे  डंक  को,  रखते  अपने  पास। मौका  पाकर  मारते,  देते  जग  को  त्रास।।1 कागा  जै...