गांठ में नहिं है पैसा होते दीन शिकार

कुंडलियां 
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रोजी   के   लाले    पड़े,   लोग  हुए  बेकार ।
आया  समय मशीन का, होते  दीन   शिकार।।
होते   दीन  शिकार,   गांठ  में  नहिं  है  पैसा।
लाते   एक   मशीन, काम  जो  करती   वैसा।।
कविवर कहे विचार, दीन की किस्मत  खोटी।
मिलता  नहिं  है  काम, तरसता   रोजी  रोटी ।।
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         कमलेश नागवंशी-बनखेड़ी 🌹 


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