1
मैंने देखा साईकिल, किस्सा रहा सुनाय।
धीरे से मां बोलती, तुझको देय लिवाय ।।
तुझको देय लिवाय,पिता की हालत कड़की।
होने लगा विवाह, खुली आशा की खिड़की।।
धड़कन रहा छिपाय, माथ चिंतन की रेखा।
बैठा दुल्हन पास, साइकल मैंने देखा।।
2
जबसे रुपया गिर रहा, ठीक नहीं हालात।
मंहगाई भी बढ़ रही, निर्धन पर आघात।।
निर्धन पर आघात, विदेशी हमें डराते।
करते रोज विवाद, नूतन टेक्स लगाते।।
बिगड़ी सारी सोच, माफ है कर्जा तबसे।
सोना हुआ है तेज, कायदे बिगड़े जबसे।।
3
मुफ्त राशन मिल गया,फोकट हुआ इलाज।
सोच बनी है आलसी, विकृत हुआ समाज ।।
विकृत हुआ समाज, रहा नहि भाई-चारा।
ठीक नहीं हालात, पंगु अब देश हमारा ।।
कहते कवि, बेढंग, देश में चलता शासन।
सोये पैर पसार, खा कर मुफ्त का राशन।।
4
रोटी रूठी दीन से, गुनहगार है कौन ?
पाते राशन मुफ्त का, बैठे रहते मौन।।
बैठे रहते मौन, सुहाती नहीं मजूरी।
आलस से लाचार, अब होती नहिं हजूरी।।
करते हैं जब काम, रकम हो कोई मोटी।
कर्ज, माफ, बेदाम, फिर क्यों कमाएं रोटी ?
5
चला न कोई जोर तो, झूठा करें विरोध।
अपनी अपनी चाल से, खड़े करें अवरोध।।
खड़े करें अवरोध, काम ना करने देते।
करते उल्टे काम, नहीं वो जिम्मा लेते ।।
नियम रखे हैं ताक, जनता सभी है सोई।
उठे अगर आवाज, सुनता उसे ना कोई।।
6
बच्चों सा कौतुक करें, खूब उड़ाने मौज।
चला न कोई जोर तो, नई बनाते फौज।।
नई बनाते फौज, खूब है भीड़ जुटाई।
अपनी जाते भूल, विपक्ष की करें बुराई।।
रखते मन में भेद, काम करें नहिं सच्चों सा।
सदा रखे गुमराह, मेल नहिं है बच्चों सा।।
7
बिन मौसम बरसात से, बिगड़ गए हालात।
नहीं मावठा जानिए, बरसे जो दिन रात।।
बरसे जो दिन रात, खेत में बखर न जावें।
काटे नहिं है धान, उसे अब कहां छुपावें।।
उजड़े कवि के खेत, बरखा के जलपात से।
होता है नुकसान, बिन मौसम बरसात से।।
8
ऐसा पानी गिर रहा, गिरा न भादों मास।
बदल रहा पर्यावरण, होता है आभास।।
होता है आभास, सभी हैं मौसम बदले।
बिन मौसम बरसात, करम है तेरे पिछले।।
बढ़े गगन में ताप, समझ ना ऐसा वैसा।
धरती करे सुधार, गिरा कर पानी ऐसा।।
9
राहें तो सूखी नहीं, खेत खड़ी है धान।
बिन मौसम बरसात से, चिंतित हुए किसान।।
चिंतित हुए किसान, रुकी है फसल बुवाई।
थम जाएं बरसात, तभी हो खेत जुताई।।
हलधर करें उपास, मिटे ना किस्मत लेखी।
होती है बरसात, मिले नहिं रोटी सूखी।।
12
फसल उगाई जतन से, बहा पसीना खूब।
एक जरा सी भूल से, गई तपस्या डूब।।
गई तपस्या डूब, बिजूका नहीं लगाये।
नहीं बनाई बाड़, जानवर कहां भगाये।।
सूना छोड़ा खेत, रुग्णता बहुत सताई।
सारी हुई बेकार, जतन से फसल उगाई।।
13
रहता रमणी साथ में, देखत मुखड़ा रोज।
उर में रखता बिंब को, मन में जाके खोट।।
मन में जाके खोट,लाज ना तुम तुझको आवे।
और किसी की नार, आईना तुझे सुहावे ?
कविवर पूछें हाल, आइना हंसकर कहता।
करती मुझसे प्रेम, संग में उनके रहता।।
14
अलता लाली पांव में, पैजन की झंकार।
बिछुआ,नख भी शोभते, करधन झालर दार।।
करधन झालर दार, कान में कनक बालियां।
बिंदी लगी लिलार, नाक में मणि नथुनियां।।
होंठ पंखुड़ी लाल, देह है अजब निराली।
किया रूप सिंगार, लगा कर अलता लाली।।
16
जय हो तुलसी दास की, राम नाम के साथ।
हनुमत वीरा संग में, लिए पताका हाथ।।
लिए पताका हाथ, राम का पता बताए।
चित्रकूट के धाम, राम की कथा सुनाए।।
रचा काव्य महान, कहाये बड़े मनीषी।
कविवर गाते नाम, पुकारें जय हो तुलसी।।
17
साजन राह निहारती, मन को रही टटोल।
आंखों का पानी मरा, सूखे हुए कपोल।।
सूखे हुए कपोल, धीरज नहीं जो रखते।
बजते हैं जब ढोल, पैजना पांव खनकते।।
कवि ना छोड़े आस, रुके हैं कोई कारन।
मन की मिटे खटास, तभी तो आयें साजन।।
18
वृंदावन की राधिका, बरसाने की नार।
राग रागिनी गा रहीं, नाचत नंद कुमार ।।
नाचत नंद कुमार, बाजती पग पैंजनियां।
बाढ़त राग खुमार, राधिका लेत बलैयां।।
जपत श्रीश पद रेख, गोपियां करती नर्तन।
मूरति नचती देख, वृंदा नचत वृंदावन।।
19
कजरा हो जो आंख में, कुमकुम लगे लिलार।
माथे जब बिंदी लगे, लाती और निखार।।
लाती और निखार, साथ में कुंडल दमके।
केश घटा के पार, दामिनी चमके जैसे।।
कामुक बहे बयार, देख कर यौवन गदरा।
सजना रहे निहार, ढलक ना जाए कजरा।।
20
दुनिया दारी सीख लो, बने रहो नहि ढोर।
मात-पिता की सीख लो, मिलता जग में ठोर।।
मिलता जग में ठोर, बनता कुटुम्ब हमारा।
सुख में कर सम्मान, कष्ट में बनो सहारा।।
बोल मधुर से बोल, चला नहिं शबद कटारी।
बात जगत की मान, सीख ले दुनिया दारी।।
22
रोटी रूठी दीन से, हुआ भ्रष्ट जब तंत्र।
काम सभी होने लगे, चलें लोह के यंत्र।।
चलें लोह के यंत्र, सौ का एक संभाले।
छोटे छोटे काम, श्रमिक किये हवाले।।
होता बीच दलाल, रकम उगाहते मोटी।
बहा पसीना खूब, मिले नहिं पूरी रोटी।।
23
मान बढ़ाती बेटियां, विश्वपटल पर आज।
पुरा काल से रख रही, हिंद देश की लाज।।
हिंद देश की लाज, आज भी रहीं बचाती।
मन में लेतीं ठान, नहीं वो पीछे जाती।।
होता है विश्वास, बहम का किला गिराती।
करके काम अनेक, देश का मान बढ़ाती ।।
25
हर युग में होता रहा, विकलो का अपमान।
ऊंच नीच की रेख ने, धो डाले अरमान।।
धो डाले अरमान, अनीति आज भी होती।
रखे न कोई ध्यान, दीनता हरदम रोती।।
रोग बहुत बेकार, लगे वो इसको ढोता।
लगे इसी पर रोक, रोग जो हर युग होता।।
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कमलेश नागवंशी-बनखेड़ी 🌹
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