सृष्टि का सिंगार



सृष्टि का सिंगार 
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साॅंचा ढला वदन तुम्हारा,इसको जरा संभाल।
झीने अंबर में दिखता है,कंचन बदन कमाल..
कंचन बदन केश बदरा से, माॅंग दामिनी रेख। 
नयन सरोवर दीपध्वज है,बनता सुरधनु पेख।।
होंठ लालिमा टेसू लज्जित,झुके लाज से भाल
कानों के कुंडल से दमके, कोमल दोनों गाल..1
झीने अंबर में दिखता है,
कंचन बदन कमाल,
साॅंचा ढला वदन तुम्हारा,
इसको जरा संभाल…………….
बिंदी लागे उगता सूरज, भौंहें धनुष कमान।
हॅंसुली हार गले में डाले,मधुर मधुर मुस्कान।।
नाक नथुनिया मोती लागे,पुष्प डली हिमखंड।
बाजूबंदा कसक रहा हैं, मांसल हैं भुजदंड।।
शैल शिखर उरोज तुम्हारे,पड़ी फूल की माल.2
झीने अंबर में दिखता है,
कंचन बदन कमाल,
साॅंचा ढला वदन तुम्हारा,
इसको जरा संभाल…………….

हिलें होंठ तो चमचम चमकें, मोती जैसे दांत।
कपूर वरण कंठ तुम्हारा,दिखे हलक की आंत।
करधोनी कटि पर लहराती,लेती ताल हिलोर।
महावर बिछुआ छटा न्यारी, देते चित्त झकोर।
पायल भी तो तान सुनाती, होते सब बेहाल..3
झीने अंबर में दिखता है,
कंचन बदन कमाल,
साॅंचा ढला वदन तुम्हारा,
इसको जरा संभाल…………….
रति की मूरत तेरी काया, सृष्टि का है सिंगार।
कलियों जैसी इस देही का, कौन है सृजनहार।
है कृति तू बेजोड़ धरा की, अनुपम तेरा प्रेम।
देख तुझे मन कहता मेरा, बरसाओ तुम क्षेम।।
और हमेशा बस कर रहना, नयनों में हर हाल.4
झीने अंबर में दिखता है,
कंचन बदन कमाल,
साॅंचा ढला वदन तुम्हारा,
इसको जरा संभाल…………..
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    सरसी छंद:-कमलेश नागवंशी-बनखेड़ी

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