जुड़ती कड़ियां, संत भूरा भगत
संत भूरा भगत,
हमें अगर किसी बात की खोज करना है तो सभी समाजों, प्रचलित किंवदंतियों, लेखों, का सहारा लेना आवश्यक होता है। मैं कुछ इसी तरह से खोज कर संत भूरा भगत की जानकारियों की कड़ियों को एक धागे में पिरोने की कोशिश कर रहा हूं।
संत भूरा भगत महाराज का जन्म आज से सैकड़ों साल पहले कातिया जाति के नागवंशी परिवार में हुआ। भूरा भगत लांजी गढ़ के राजा के पुत्र थे। बचपन से ही धार्मिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक पृष्ठभूमि संबंध रखते थे। उनके पिता का नाम राजा सयमल तथा मां का नाम झमियां है। इनके जन्म समय पर कई मत भेद हैं। कोया समाज के ग्रंथों में भी सटीक समय नहीं मिलता। कुछ लोग इनका जन्म समय १६वीं शताब्दी मानते हैं।
उनकी कद-काठी सामान्य तथा बलिष्ठ थी। रंग गोरा होने के कारण उनका नाम भूरा रखा गया,जैसा आप जानते हैं पहले पैदा होने के दिन, तिथि, माह, बनावट के आधार पर नाम करण किया जाता था। कहते हैं बालक भूरा एक बार शिव के ध्यान में इतने लीन हो गए कि इनकी समाधि लग गई। इस घटना से इनको आध्यात्मिक शक्ति और शांति मिली। इनका विवाह गौड़ समाज की कन्या कोतमा से हुआ था। इससे जान पड़ता है कि गौड़ समाज और कातिया समाज में रोटी-बेटी का चलन रहा होगा। बचपन से शिव भक्त होने के कारण इन्होंने तप करने के लिए सतपुड़ा पर्वत माला को चुना। गौड़ समाज के अनुसार इनके सात पुत्र और पांच पुत्रियां थीं।
तप करने के लिए इन्होंने धवला नाम की सतपुड़ा पर्वत की चोटी को चुना। मैकल पर्वत भी आध्यात्मिक तपस्थली है किन्तु इन्होने तप करने करने के लिए ऐसा जंगल चुना जो निर्जन होने के साथ वहां शिव का निवास भी हो। आपने गृहस्थ जीवन को त्यागने से पहले पूरे कर्तव्यों को पूरा किया। कहते हैं माई कोतमा भी इनका पीछा करते तप स्थली पर पहुंच गईं और उनकी सेवा में लगी रहीं। आज भी इनका शिला रूप भूरा भगत के शिला रूप से अलग स्थापित है।
गौड़ (कोया) समाज में भूरा भगत को विशेष स्थान दिया गया है। यूट्यूबर भरत पंद्राम भूरा भगत सुमरनी,गौड़वाना आरती संग्रह लेखक श्री एम.एल. इवनाती जी ने भूरा भगत सुमरनी में भी इनको कातिया समाज के नागवंशी परिवार का बताया है और दाई कोतमा वर्णन किया है।
श्री उमेश चन्द्र नागवंशी जी “बेतूली” द्वारा रचित भूरा भगत चालीसा में संक्षिप्त जीवनी में लिखा गया है कि भूरा भगत कोया समाज में भी पूजे जाते हैं और इनके पुत्र भीमाल देव (पोय) हैं जो प्रकृति के जानकार हैं। कोया समाज के अनुसार इनकी पांच पुत्रियां हैं जिनमें सबसे छोटी खेरोमाई (कोया समाज “खेरो दाई”) नाम से प्रसिद्ध हैं जिन्हें हम आज खेरापति के नाम से जानते हैं। श्री बेतूली जी ने भूरा भगत का जन्म सांगाखेड़ा तथा कोया समाज ने लांजी गढ़ बैहर बताया है। क्या आप अंदाजा लगा सकते हैं हमारे गांवों को किसने बसाया था? शायद जबसे गांव बसे हुए हैं तब से ही खेरापति को स्थापित किया जाता रहा होगा। हमें अपने गांव की खेड़ापति की स्थापना कब हुई यह भी नहीं पता। हमारी कातिया समाज में ठाकुर बाबा को विशेष स्थान दिया गया है ठाकुर बाबा को कोया समाज भी मानती है। कतिया समाज में एक देवता और मैंने सुना है उसे माठिया कहा जाता है कोया समाज में मुठुआ देवता होता है।
एक और बात यह है कि आज भी गौड़ समाज के कुछ लोग अपनी बेटी की ससुराल में भोजन पानी नहीं करते शायद यही वजह है कि वे आज भी कतिया समाज के यहां भोजन नहीं करते। विवाह के समय मंडप के नीचे पुरखों की पूजन विधि कुछ कुछ समानता लिए हुए है। बोर माटी,खेरापति पूजन।
इससे ऐसा लगता है कि हमारे देव भूरा भगत का जन्म सदियों पहले हुआ होगा और उनकी पुत्री(खेरोमाई) अपनी शक्तियों से धीरे-धीरे क्षेत्र में प्रसिद्धि पाती गईं। हमारी कातिया समाज नारायण देव को मानता है और गौड़ आदिवासी समाज भी। अगर १६वीं शताब्दी में जन्म हुआ होगा तो इतनी ख्याति नहीं मिल पाती।
चूंकि हमारा समाज गौड़ समाज से आज भी पिछड़ा हुआ है।हम अपनी संस्कृति को भूलते जा रहे हैं और नई संस्कृति को अपना रहे हैं। इस कारण भी हमारा इतिहास मिटने लगा है। कुछ लोगों को मैंने पारसी बोली में बात करते हुए देखा है, यह पारसी,मराठी थी या बेतूली। विवाह के रीति-रिवाज भी भूल गए हैं। पहले देवताओं का पूजन मंत्रों द्वारा नहीं किया जाता था उनका पूजन नाम लेकर किया जाता था।
श्री सी.एल.नागवंशी बनखेड़ी, अपनी पुस्तक में लिखते हैं “गौड़ी धर्म सदा विचार पुस्तक के अनुसार इस जाति में शिव जी का महान भक्त भूरा नाम से हजारों वर्ष से विख्यात है, जिसकी मूर्ति की पूजा धवला गिरि पहाड़ में महादेव के पूजन के प्रथम की जाती है। महादेव की मूर्ति के सामने भूरा भगत की पत्थर की मूर्ति है। यह देव जाति का कतिया है।” इस गौड़ जाति में कातिया समाज का व्यक्ति पूजन कार्य कराता था जिसे भगत कहा जाता था।
इस आधार पर हम कह सकते हैं चौरा गढ़ महादेव की स्थापना संत भूरा भगत ने की थी और उनकी पत्थर की मूर्ति को (भूरा भगत)उनके मानने वाले भक्तों ने शंकर जी के सामने स्थापित की होगी। आज जन-मानस उन्हें चौड़ा महाराज कहने लगे हैं कुछ दिनों बाद उनकी जाति भी बदल जायेगी, मंदिर में कब्जा तो हो गया है। मैंने देखा है वहां पर कोई मंदिर नहीं था, दोनों मूर्तियां खुले आसमान के नीचे स्थापित थीं, कोई पुजारी नहीं। पूर्व दिशा में कुछ नीचे छोटा-सा कुआं था जो कि लगभग तीन-चार फुट गहराई में पानी था। मैं जब पहली बार चौरा महादेव गया था तब सीढियां नहीं थीं। हमारे साथ गांव के ठाकुर दादा जी थे। उन्होंने ही बताया था कि ये भूरा भगत हैं। वहीं से नांदिया गांव भी दिखाया था।
सांगाखेड़ा भूरा भगत मंदिर में अभी कोई पुजारी या भगत नहीं है, क्योंकि अभी किसी पंडा जी की नजर इसकी चढ़ोत्तरी पर नहीं पड़ी। जिस दिन चढ़ोत्तरी पर नजर पड़ गई तो पंडा जी कब्जा कर लेंगे जैसे चौरा महादेव मंदिर में हो गया।
पहली बार जब मैंने अम्मा माई के दर्शन किए थे जब माता जी की छोटी-सी मढ़िया थी। लगभग चार फुट ऊंची। हां वहां पर एक माता जी रहती थीं। जो हमारे साथ समूह के बुजुर्गों को पहचानती थीं क्योंकि ये लोग प्रत्येक वर्ष रोहणी(नवतपा)में महादेव दर्शन करने जाते थे।
निरंतर.........
आओ भूरा भगत चलें 👈 एक बार अवश्य पढ़ें 🙏
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