सुनिये चित्त लगाय
*******************************
छेड़ा तुमने खूब धरा को, खोदे गिरिवर ताल।
धुंध धुंआ की भर वायु में, बहुत बजाते गाल।।
बिन मौसम बरसात कराते, बनते हैं नादान।
मकसद छोड़ो आय कमाना,करदो बंद खदान।।
********************************
छेड़ा तुमने खूब धरा को, खोदे गिरिवर ताल।
धुंध धुंआ की भर वायु में, बहुत बजाते गाल।।
बिन मौसम बरसात कराते, बनते हैं नादान।
मकसद छोड़ो आय कमाना,करदो बंद खदान।।
********************************
आज विषय गंभीर है, लिखने को उद्गार।
मर्यादा में पेश है, मेरे विपुल विचार।।
हुए लोग बेशर्म तो, जनता मारे मार।
चौराहे के बीच में, उतरे सभी बुखार।।
काबू से बाहर हुए, लोगों के व्यवहार।
हुए लोग बेशर्म अब, सीधे हैं लाचार।।
********************************
संत सदा परहित करें, होवे नीम समान।
कड़वी होती औषधी, ऐसे संत महान।।
कंचन दुर्जन होत हैं, पावक संत समान।
आंच पड़े दुर्गुण मिटे, संतों की पहचान।।
संत कथा तुम बेठिये, सुनिये चित्त लगाय।
गूढ़ गूढ़ रहस्य मिलें, हिय में लेय बिठाय।।
********************************
कमलेश नागवंशी-बनखेड़ी

टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें