आत्मा और प्रेम

 आत्मा और प्रेम,
     मैं उस व्यक्ति से आत्मा से प्रेम करता हूं। वह मुझसे आत्मा से प्रेम करता है। उस व्यक्ति की आत्मा इस पर टिकी हुई है। उस व्यक्ति की आत्मा इसको देखने में लगी थी इसलिए इतने दिनों से बीमार होने पर भी आत्मा नहीं निकली।
    ऐसा हम यदा-कदा सुनते रहते हैं, पर किसी ने यह जानने की कोशिश की, कि क्या आत्मा भी प्रेम करती है? 
   तो दो मिनट रुक कर सोचो...............
    आत्मा अमर है, सूक्ष्म से भी सूक्ष्म है। 
    अगर आत्मा किसी से प्रेम करती हैं तो जब कोई व्यक्ति या जीव मरता है तो प्रेम करने वाली आत्मा उसके साथ क्यों शरीर नहीं छोड़ देती ? व्यक्ति एक दूसरे से इतना प्रेम करता है कि उसके लिए मरने-मारने के लिए तैयार हो जाता है पर वह उसकी मृत्यु पर स्वाभाविक रूप से मरता नहीं है। बहुत सी बार सुना होगा कि वह उस व्यक्ति से बहुत प्रेम करता था उसके मरने के कारण वह भी मर गया। किंतु ऐसा नहीं है ये आत्मा का प्रेम नहीं ये उसके मन-मस्तिष्क को लगे सदमे के कारण रक्त संचार में गति के बढ़ने के कारण होता है। रक्त का दबाव बढ़ने से मस्तिष्क काम करना बंद कर देता है। व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है या पागल हो जाता है।
     कहते हैं कि उस व्यक्ति ने उसे आत्मा से श्राप दिया था जो कि सफल हुआ, ऐसा भी नहीं है आत्मा श्राप भी नहीं देती यह श्राप उसके मन की चेतना को एकत्रित कर, उचित समय, पर बोले गए शब्द होते हैं जो कि सुषुप्त मन और कुंडलिनी के क्षणिक जागृत होने पर बोले गए हैं परन्तु ऐसा नहीं कि हमेशा सही हो। जीवन काल में ऐसी परिस्थिति बन जाती है और हम उसे उसके श्राप से जोड़ देते हैं।
       प्रेम, हमारा मन करता है। प्रेम मस्तिष्क की उपज है,दिल की नहीं ना आत्मा की। मन, किसी से भी प्रेम कर सकता है। आत्मा बंधन से परे है वह प्रेम के जाल में नहीं फंसती। प्रेम उसी से होता है जो भौतिक होता है या जिसे मन यथार्थ मान लेता है।
    अगर आत्मा प्रेम करती है तो शरीर को क्यों छोड़ देती है? 
    अगर आत्मा प्रेम करती है तो शरीर छोड़ देने के बाद उसी घर में जन्म क्यों नहीं लेती ?
    हमारा या किसी भी जीव का मन ही प्रेम करता है और वह चंचल भी है कब जानी दोस्त का जानी दुश्मन बन जाये कोई नहीं जानता। 
    आत्मा को इन सांसारिक मोह-माया से कोई सरोकार नहीं। 
जो स्वयं अजय, अमर, अखंड, अभेद्य है उसे कभी भी नश्वर देह से प्रेम न
हीं हो सकता।

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